Sunday, 6 December 2015

बीसीसीआई के बस इस छोटे से स्वार्थ के लिए हो रही भारत-पाक सीरीज

कितना हास्यास्पद है कि पेरिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के नवाज शरीफ के मध्य हुई तीन मिनिट की मुलाक़ात में क्रिकेट के आकाओं तथा खेल पत्रकारों ने यह कहना शुरू कर दिया कि दोनों के बीच दोनों देशो के क्रिकेट मैच को कराने सम्बंधित कोई बात हुई होगी। सोचिये, पेरिस में दोनों राष्ट्राध्यक्ष क्रिकेट की बात करेंगे? दुनिया में इसके अलावा कोई और मुद्दा है ही नहीं। क्रिकेट ही एकमात्र ऐसा मुद्दा है जिसके होने, न होने से दो देशों के आपसी सम्बन्ध निर्धारित होते हैं। यह सोच ही बेवकूफी भरी है। किन्तु बाजार ऐसी सोच को विस्तार देता है ताकि अपना उल्लू सीधा किया जा सके।

बहरहाल, पिछले कुछ महीनों से भारत बनाम पाकिस्तान के क्रिकेट मैच को लेकर दोनों क्रिकेट बोर्ड उत्साहित हैं। इसके लिए भूमिकाएं तैयार की जा रही हैं, तो एक मसौदा भी तैयार कर लिया गया कि अगर दोनों देशो में क्रिकेट मैच न हो सके तो इसे तीसरे किसी देश में कराया जाए। यह तीसरा देश श्रीलंका हो सकता है। आप सोचिये, आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है कि दोनों देश क्रिकेट खेलें ही? नहीं खेले तो संभव है तीसरा विश्व युद्ध छिड़ जाएगा?

सच कहूं तो हंसी आती है क्रिकेट बोर्ड के मनोरथ पर। कुतर्क देखिये कि खेल को राजनीतिक स्तर पर नहीं देखना चाहिए। दोनों देशो के लोग क्रिकेट को प्यार करते हैं और दोनों देशों के मध्य हुए क्रिकेट से प्रेम, भाईचारे और शान्ति का पैगाम दुनिया में जाएगा। यह सच है कि भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता अन्य सभी खेलों से अधिक है। इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि इसकी लोकप्रियता की आड़ में देशप्रेम तथा देश की राजनीति भुनाई जाए। और एक बड़ा बाजार बनाकर दौलत बटौरी जाए।

जी हां, क्रिकेट खेल जितना व्यापक है, उतना ही बड़ा एक बाजार है। शोहरत और दौलत में डूबे इस खेल की एकमात्र सोच यह होती है कि कौनसी सीरीज से कितना पैसा कमाया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड भले क्रिकेट को लेकर संजीदा हैं किन्तु वह भी यह जानता है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई टूर्नामेंट होता है तो धन वर्षा संभव है। जितने मैच एक सीजन में होते हैं और उससे कमाई होती है, उतनी कमाई भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाला एक टूर्नामेंट या एक सीरीज ही कर लेती है। इसे फिर कौन अनदेखा करेगा?

अब आइये इस सवाल पर कि आखिर ऐसा क्या है दोनों देशों के मध्य कि इतनी कमाई होती है? सीधा सा उत्तर है दोनों देशों के बीच का माहौल खराब है। जब ऐसे खराब माहौल में कोई क्रिकेट मैच होता है, तो दोनों देशों की जनभावनाएं आपस में टकराती है। मैच तो क्रिकेट का होता है किन्तु खेल जनभावनाओं का चलता है। परिणाम तो क्रिकेट का निकलता है किन्तु हत्या जनभावनाओं की होती है। ऐसे में लाजमी है कि लोग अपनी टीम की जीत के लिए भर-भर कर स्टेडियम पहुंचे, टीवी स्क्रीन पर चिपके बैठे रहें।
उधर, क्रिकेट बोर्डो की झोली में दनादन धन वर्षा होती रहे। अन्यथा कोई कारण नहीं दिखता जब देश पाकिस्तानी आतंकवाद से जूझ रहा है, जब देश के वीर सैनिक पाकिस्तानी आतंक का शिकार होकर शहीद हो रहे हैं, जब देश में पाकिस्तान की आईएसआई अपने जासूस भेज कर सेना तक में सेंध लगाने की फिराक में हो, जब पाकिस्तान भारत के शहरों में अपने आतंक से हडक़म्प मचाने की सोच रखता है, जब पाकिस्तान सीमापार से लगातार घुसपैठ को अंजाम देता है, जब पाकिस्तान हमारे कश्मीर को हड़पने की साजिशें रच रहा है, जब पाकिस्तान भारत को नेस्तनाबूत करने की सोच रखता है, तब क्रिकेट जैसा कोई खेल कौन सा अमन और शान्ति का कबूतर बनकर उड़ सकता है? और क्रिकेट आखिर क्यों खेला जाए?

क्या कंगाल हो रहे पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की झोली भरने के लिए? क्या देश भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के लिए? अब इस बात पर आइये और समझने की कोशिश कीजिये कि खेल होता क्या है? दो देशो के बीच खेल तभी होता है जब वे दो देशो की आंतरिक स्थितियां सुधरी भी हों और देशों के मध्य सम्बन्ध भी अच्छे हों ताकि खेल से इस सौहार्द भरे वातावरण को चौगुना किया जा सके।

ऐसा अगर नहीं होता और आप यह मानकर चलें कि खेल खेल होता है, इसे दूसरे नजरिये से देखना ठीक नहीं, तो फिर आप उस माहौल का जिम्मा क्यों नहीं लेते जब देश में इसकी हार और जीत से भावनाओं में उबाल देखने को मिलता है। स्थितियां विकट तक हो जाती हैं। उत्तेजनाओं से देश की जन सागर में लहरें किसी चक्रवाती तूफ़ान का रूप ले लेती हैं। और फिर हमारी सरकार को, हमारी क़ानून व्यवस्था को तमाम स्थितियों पर नियंत्रण के लिए अतिरिक्त समय व्यय करना पड़ जाता है।

क्या यह सब भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट में अब तक के इतिहास में देखने नहीं मिला? इसके बावजूद वो लोग कौन है जो क्रिकेट से दो देशों के सम्बन्ध मधुर हो जाने की बात करते हैं और देश की जनता के साथ धोखा करते हैं? क्रिकेट ही अगर संबंधों के सुधार का पैमाना होता तो अब तक कितने सारे मैच हो चुके हैं। भारत और पाकिस्तान दो शांत मुल्क होते। कश्मीर भारत के आँगन में बेखौफ लहलहाता रहता।

भारत पाकिस्तानी आतंकवाद से मुक्त होता और पाकिस्तान भी भारत को लेकर अपनी शैतानी हरकते नहीं करता होता। इसे बेवकूफी और मूर्खता के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता कि बोर्ड महज अपने स्वार्थ और अपने निजी हितों के लिए अपनी टीम को झोंकना चाहता है। पाकिस्तान तो चाहेगा कि भारत से खेले क्योंकि पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड की हालत भी दयनीय है और उसका देश भी अपनी नापाक हरकतों से दुनिया में बदनाम है, अगर भारत उसके फेंके जाल में उलझ जाता है तो उसके वारे-न्यारे हो सकते हैं।

पता नहीं भारतीय क्रिकेट बोर्ड क्यों उत्साहित है? और क्या वो पाकिस्तान के साथ नहीं खेलेगा तो उसका क्रिकेट ख़त्म हो जाएगा? आखिर वो क्यों नहीं पाकिस्तान पर दबाव बनाता कि पहले वो अपनी आतंकवादी गतिविधियां ख़त्म करे, पहले वो भारत में अपनी घुसपैठ रोके, पहले वो अपने ईमानदार होने का सबूत दे उसके बाद ही कोई और किसी प्रकार के खेल के बारे में भी सोचा जा सकता है अन्यथा कभी नहीं ।
अगर भारतीय क्रिकेट बोर्ड ऐसा सोचकर कोई कदम उठाता तो देशवासियों के लिए उसके प्रति प्रेम और अधिक बढ़ जाता। साथ ही वह भी देश के कार्यों में अपना सही दिशा में योगदान देता हुआ नजर आता।

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