Sunday, 17 April 2016

अपनी व्यथा

सात साल का लम्बा वक्त गुजार कर, अपनी 12th पुरी कर हम सभी अपनी-अपनी राह निकल लिए…

इन सात सालो में बहुत कुछ अनुभव किया, बहुत कुछ सिखा, नये-नये दोस्त मिले, आज सभी अलग हो रहे थे…

अलग हुए और सभी अपने-अपने रास्ते निकल लिए…मैं भी अपने ग्रह जिले को छोडकर कोलेज करने नये जिले में आ गया…
यहाँ आया तो एकदम अंजान, किसी को भी नही जानता था, पर जैसे-जैसे समय बीतता गया अपने को ढालता गया…

नवोदय से निकलने के ठिक 3 महीने बाद अचानक एक फोन आया, सामने से पुराने  मित्र की आवाज आई…" हाँ रमेश कैसा है"…"बस बढीया है अपना सुना"…"बस मौज में है…आर्मी का फोर्म भरा था…सेंटर तेरे यहाँ आया है…हम तीनो(नवोदय के) तेरे यहाँ आ रहे है, बन्दोबस्त कर लेना"… मेरी खुशी का ठीकाना न रहा कितने दिनो बाद मिलने जो जा रहे थे | मैने भी अपनी तरफ़ से कह दिया "हाँ पुरा बन्दोबस्त है… एक दिन पहले ही आ जाना"…

तीन दिन बाद वो तीनो ही आए… मैं भी मन में खुशी लिए उनको रेलवे स्टेशन से लेने तक गया… "मुझे लगा की रात को 3 बजे ट्रेन पहुचेगी और मुझे अपनी नींद पर पुरा भरोशा था की चाहे लाउड स्पीकर भी बजते रहे, मेरी नींद आसानी से नही खुलेगी"…इसलिए मैंने पुरी रात जाग कर ही काटी…
वो तीनो आए…बहुत देर स्कुल की बातो को याद किया…और मैं इन बातो-बातो में भुल ही गया था की मैं खाने का बन्दोबस्त तो करना भुल ही गया था… हाँलाकी ऐसी बात नही है की मेरे रुम में रसोई की व्यवस्था नही थी… पर बात यहाँ भी जात की थी…अपने साथ राजपुती शान को लाए लडके मेरे यहाँ तो खाना नही खाएगे… खाने की बात छोडीए, पानी भी तो नही पीयेगे… तब मैं बाजार से जा के पानी की दो बोलते ले आया…मैंने सोचा…चलो दो दिन की ही तो बात है फ़िर होटल किसलीए है… तभी अखबार उठाया तो लिखा था "आर्मी भर्ती रद्द दो दिन बाद होगी" मुझे दुख हुआ…दुख इस बात का नही की भर्ती रद्द हो गई बल्की इस बात का की अपने ही रुम में…अपने साथ हो रहा भेदभाव मुझे अब दो दिन और सहना पडेगा… पुरे चार दिन रुके, पर इन चार दिनो में बडा ही गहरा सदमा दे गये थे…और गहरी सीख भी…

मैं बस  ढो ही रहा था…बाजार से बोतले…और जातिय भेदभाव…
मैंने इन चार दिनो में तीन-साढे तीन हजार खर्च किए…जो मैने अपने ऊपर हो रहे भेदभाव पर खर्च किए…
हालाँकी इसमें दोष उनका नही था…स्पष्ट रूप से मेरा था…मैं ऐसो को अपना दोस्त समझ बैठा था…
पर अब मैं अपनी यह गलती नही दोहराना चाहूँगा…

Thursday, 14 April 2016

बाबा साहेब का देश के लिए योगदान

भारत की मुद्रा समस्या के बारे में डॉ अंबेडकर ने हिल्टन युवा आयोग के सामने जो विचार प्रस्तुत किए वे उनकी मुद्रा समस्या के विषय में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान थे। आयोग ने अपनी रिपोर्ट सन 1926 में प्रस्तुत की।  इसी रिपोर्ट के आधार पर 1 अप्रैल 1935 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना हुई ।

श्रमिक कल्याणकारी कानून और डॉ अंबेडकर (भविष्य  निधि (PF) और रोजगार कार्यालय के जनक)

2 जुलाई, 1942 को वाइसरॉय की एक्जिक्यूटिव कौंसिल में डॉ अंबेडकर को श्रम सदस्य (वर्तमान समय में लेबर मिनिस्टर ) के रूप में शामिल किया गया । मालिक मजदूरों के तमाम संघर्षों में उन्होने मजदूरों का साथ दिया । 7 मई 1943 को उन्होंने त्रिपक्षीय श्रम सम्मेलन द्वारा संस्थापित स्थायी श्रम समितियां और रोजगार कार्यालय स्थापित करने के लिए पहल किया । आज जो हम हर जिले में रोजगार कार्यालय (इम्प्लॉइमेंट एक्स्चेंज ) देख रहे हैं, वो डॉ अंबेडकर की ही देन है । श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए उन्होने भविष्य निधि योजना ( प्रोविडेंट फ़ंड ) लागू करवाया । उन्होंने नौकरीपेशा लोगों के लिए काम के घंटे तय करने में भी भूमिका निभाई। उनका मानना था कि एक व्येक्ति का काम करने का घंटा निश्चित रहना चाहिए।
अप्रैल 1944 में डॉ. अंबेडकर ने एक संशोधन बिल पेश किया कि निरंतर काम करने वाले मजदूरों को सवेतन अवकाश दिया जाए ।  नवंबर 1945 में उन्होंतने उड़ीसा में वहां की नदियों के विकास के लिए एक बहुउद्देशीय योजना शुरू की जो अंतत: हीराकुंड बांध के रूप में कारगर हुई। डॉ. आंबेडकर ने हीरा कुंड बांध योजना में महत्वीपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि जल मार्गों का विकास कर सस्ते  यातायात को बढ़ावा दिया जा सकता है। उनका कहना था कि बिजली का उत्पासदन और सिंचाई योजनाओं का विकास भारत के औद्योगिकरण के लिए और आर्थिक विकास के लिए अति आावश्ययक है। उन्होंकने भारत की खनिज संपदा के विकास और उत्खनन के लिए एक विस्तृ‍त योजना प्रस्तुत की और जोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का पुनर्गठन किया।
(आनंद श्रीकृष्ण जी के वॉल से)

Monday, 4 January 2016

आरक्षण को लेकर भ्रम और तथ्य

रिजर्वेशन यानी आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जो समय-समय पर देश में चर्चा का मुख्य विषय बन जाता है। देश की ज्यादातर जनता, खासकर नई जनरेशन का अधिकतर हिस्सा भी आरक्षण के बारे में उन्हीं बातों को जानता है जिसे वह मीडिया के माध्यम से सुनता-पढ़ता है।

पिछले दिनों एक मैगजीन में आरक्षण विषय पर पूर्व आईएएस अधिकारी पी.एस. कृष्णन का लेख पढ़ा। ‘आरक्षण के तथ्य और मीडिया में गलत बयानबाजी’ नाम के इस लेख के अनुसार आरक्षण को लेकर जनता में कई तरह की गलतफहमियां हैं, और कई मीडियाकर्मी भी इस बारे में अल्पज्ञान रखते हैं। इस लेख के कुछ अहम अंश आप सभी से साझा करना चाहता हूं।

भ्रम : इस देश में आरक्षण की शुरुआत वोट के भूखे राजनेताओं ने शुरू की थी।

तथ् पहली बार आरक्षण की शुरुआत 1902 में कोल्हापुर के राजा छत्रपति साहू जी महाराज ने की थी। फिर 1921 में मैसूर के महाराजा ने आरक्षण लागू किया था। 1921 में ही मद्रास प्रेसिडेंसी (वर्तमान तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल का उत्तरी हिस्सा और कर्नाटक का कुछ हिस्सा आता है।) में जस्टिस पार्टी ने आरक्षण की शुरुआत की थी। यहां गौरतलब है कि ब्राह्मण एकाधिकार को चुनौती देते हुए और उसका दमन करने के वादे के आधार पर ही जस्टिस पार्टी सत्ता में आई थी। इस तरह आरक्षण की शुरुआत राजाओं और भारतीय राजनीतिज्ञों द्वारा की गई थी।

भ्रमः 1950 में भारत के संविधान के बाद आरक्षण की शुरुआत हुई थी।

तथ्यः राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण को डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की पहल पर 1943 में ही लागू किया गया था। उन्होंने यह समझ लिया था कि अंग्रेजों के बाद जिनके हाथों में भारत की बागडोर होगी, वे अनुसूचित जातियों को आरक्षण व अन्य सहूलियत देने में हिचकिचाएंगे। यही कारण था कि वह वायसरॉय के कार्यकारी परिषद में बतौर सदस्य शामिल हुए थे।

भ्रमः संविधान द्वारा सिर्फ दस वर्षों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

तथ्यः आरक्षण की तीन श्रेणियां हैः
1.राज्यों के पदों और सेवाओं में आरक्षण (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों, यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थाओं सहित सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 12 की व्याख्यानुसार स्टेट का दर्जा प्राप्त संस्थाएं।)
2.शिक्षण संस्थानों की सीटों में आरक्षण।
3.लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में सीटों का आरक्षण। आमतौर पर जिसे राजनीतिक आरक्षण के रूप में संबोधित किया जाता है।

इनमें से केवल तीसरी श्रेणी के आरक्षण के लिए शुरू में 10 वर्षों का प्रावधान था। जबकि एक और दो श्रेणी के आरक्षण के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी। बहुत सारे विद्वान और ऐंकर तीसरी श्रेणी की 10 साल की समयसीमा को पहले और दूसरे श्रेणी के लिए भी बताते हैं जबकि उनके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं थी।

भ्रमः आरक्षण का उद्देश्य गरीबी खत्म करना या कम करना है।

तथ्यः संविधान के अनुसार आरक्षण का उद्देश्य गरीबी कम करना या खत्म करना कभी नहीं रहा। बेरोजगारी के समाधान हेतु आरक्षण को एक युक्ति के तौर पर कभी नहीं लिया गया। आरक्षण का उद्देश्य शासन और प्रशासन के ढांचे में असंतुलन को ठीक करना था। इसका उद्देश्य शिक्षा और चुनावी सीटों की उस संरचना को मजबूती प्रदान करना था जो भारतीय जाति व्यवस्था द्वारा निर्मित असंतुलन और असमानता के कारण बना था।

साफ शब्दों में कहा जाए तो शासन व प्रशासन में से उच्च जातियों के एकाधिकार को खत्म करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी जातियों/जनजातियों को समान अवसर उपलब्ध करवाने के लिए ही इस आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।

हालांकि इस संबंध में कई लोगों का कहना है कि आरक्षण को आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर लागू करना चाहिए, लेकिन संविधान में नहीं निर्देशित होने के कारण आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं होती है।
यह कॉन्टेंट अंग्रेजी की मास मीडिया मैगजीन के अंक 45 से लिया गया है और यहां उसका संक्षिप्त हिंदी अनुवाद पेश किया जा रहा है। मूल लेखक पी. एस. कृष्णन समाज कल्याण मंत्रालय में पूर्व सचिव रहे हैं और आरक्षण को लेकर इन्होंने बहुत काम किया है। वर्तमान में यह तेलंगाना सरकार में कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त सलाहकार हैं।